शुरुआत ही से दिल दहल गया जब नीली साड़ी वाली गर्भवती पत्नी सामान का बैग लेकर सीढ़ियों पर खड़ी थी। उसकी आँखों में गहरा दर्द साफ दिख रहा था। पति का व्यवहार देखकर बहुत गुस्सा आता है। मेरे हाथ में आज़ादी नामक इस धारावाहिक में ऐसे दृश्य बहुत भावुक कर देने वाले हैं। घर का माहौल कितना बदल गया है, यह देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। किसी की भावनाओं की कद्र नहीं है यहाँ। सब कुछ स्वार्थ के लिए है।
लाल साड़ी वाली प्रेमिका का घमंड देखकर हैरानी होती है। वह पति के साथ बैठकर सूप पी रही थी और मुस्कुरा रही थी। यह दृश्य मेरे हाथ में आज़ादी की कहानी को और भी जटिल बना देता है। पति की वफादारी पर सवाल खड़े हो जाते हैं जब वह अपनी पत्नी को छोड़कर दूसरी के पास होता है। यह धोखा बर्दाश्त करने लायक नहीं है बिल्कुल भी। रिश्तों की डोर टूट गई।
जब नीली साड़ी वाली पत्नी ने उन्हें साथ देखा तो उसका चेहरा पीला पड़ गया। कमरे में सन्नाटा छा गया था। मेरे हाथ में आज़ादी के इस प्रसंग में तनाव चरम पर था। पति की आँखों में शर्म नहीं बल्कि गुस्सा दिखाई दिया। यह रिश्ता अब बच नहीं सकता था। टूटे हुए सपनों की आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी उस कमरे में। सब कुछ खत्म हो गया था।
सबसे भयानक दृश्य तब था जब पति ने उबलते हुए बर्तन में हाथ डालने को मजबूर किया। यह क्रूरता इंसानियत को शर्मसार करती है। मेरे हाथ में आज़ादी में ऐसे दृश्य दर्शकों को झकझोर देते हैं। गर्भवती पत्नी की चीखें दिल को चीर जाती हैं। ऐसा व्यवहार किसी जानवर का भी नहीं हो सकता। न्याय की उम्मीद बस जाती है अब। बहुत दर्दनाक था यह।
फर्श पर गिरा हुआ खून देखकर रूह कांप गई। नीली साड़ी वाली पत्नी दर्द से तड़प रही थी। मेरे हाथ में आज़ादी की कहानी में यह सबसे दुखद पल था। बच्चे की जान खतरे में थी और पति बस खड़ा तमाशा देख रहा था। लाचारी का यह चित्रण बहुत ही शक्तिशाली था। आँसू रोकना नामुमकिन हो गया था यह देखकर। कोई मदद को नहीं आया।
लाल साड़ी वाली प्रेमिका की हंसी अब डर में बदल गई थी। जब सूप गिरा तो उसका घमंड टूट गया। मेरे हाथ में आज़ादी में किरदारों के रंग बदलते रहते हैं। शुरू में जो खुश थी, अब वही सहमी हुई लग रही थी। कहानी का मोड़ बहुत ही अनोखा था। हर किसी के इरादे साफ नहीं होते हैं इस घर में। धोखा मिलता है सबको।
पति का कोट पैंट पहना हुआ रूप उसे अमीर दिखाता था पर दिल से वह गरीब था। उसने अपनी ही पत्नी का साथ छोड़ दिया। मेरे हाथ में आज़ादी में ऐसे पात्रों से नफरत होती है। वह सामान लेकर चला गया जैसे कुछ हुआ ही न हो। यह बेरुखी इंसान को अंदर से खोखला कर देती है। विश्वास का गला घोंट दिया गया था। बहुत बुरा लगा।
अंत में पत्नी फोन पर मदद मांग रही थी। उसकी आँखों में आंसू और हाथ में खून था। मेरे हाथ में आज़ादी का यह अंत बहुत भारी था। वह अकेलेपन में चिल्ला रही थी पर कोई सुनने वाला नहीं था। यह दृश्य समाज की खामोशी को भी दर्शाता है। मदद के लिए तरसना सबसे बड़ा अभिशाप होता है। कोई पास नहीं था।
घर का रसोईघर अब खून से सन गया था। सफेद फर्श पर लाल रंग साफ दिख रहा था। मेरे हाथ में आज़ादी की मंच सजावट ने माहौल बना दिया। हर कोने में दर्द छिपा हुआ था। पति और प्रेमिका की हंसी अब कोसों दूर लग रही थी। यह जगह अब सुरक्षित नहीं रही थी किसी के लिए भी। खामोशी छा गई थी।
इस धारावाहिक ने रिश्तों की कड़वी सच्चाई दिखाई है। प्यार के नाम पर धोखा मिलना आम हो गया है। मेरे हाथ में आज़ादी देखकर लगता है कि आज़ादी मिलना कितना मुश्किल है। पत्नी को अब खुद के लिए लड़ना होगा। यह कहानी हर उस पत्नी की है जो चुपचाप सहती है। अब समय बदलने का है। ताकत जुटानी होगी।