दृश्य की शुरुआत में जो भव्य इमारत दिखाई गई, वह वास्तव में मन मोह लेती है। लगता है कि कहानी किसी बड़े अधिकारी के घर से शुरू हो रही है। बुजुर्ग पुरुष की गरिमा और चाय पीने का तरीका बहुत अनोखा लगा। जैसे ही कहानी आगे बढ़ी, वैसे ही एहसास हुआ कि बेवकूफ बना रहा, मुखिया बन के लौटा वाली कहानी में ऐसा ही कुछ मोड़ आने वाला था। दृश्य बहुत शांत लेकिन गंभीर थे।
बाहर वाले दृश्य में जब काले कपड़ों वाले पुरुष ने अंगूठी दिखाई, तो सामने वाले के चेहरे का भाव देखने लायक था। डर और आश्चर्य का मिश्रण साफ झलक रहा था। यह छोटी सी वस्तु इतनी शक्तिशाली कैसे हो सकती है, यह जानने की उत्सुकता बढ़ गई। बेवकूफ बना रहा, मुखिया बन के लौटा के कहानी में ऐसी ताकत की झलक मिलना आम बात है, पर यहाँ प्रस्तुति अलग थी।
सभा कक्ष में सभी पात्रों की बैठने की व्यवस्था बहुत दिलचस्प थी। बुजुर्ग सबसे ऊपर और बाकी सब नीचे, यह सत्ता का संतुलन साफ दिखाता है। बैंगनी कपड़ों वाले लोग झुक रहे थे, जो उनकी अधीनता को दर्शाता है। बेवकूफ बना रहा, मुखिया बन के लौटा में ऐसे राजनीतिक खेल हमेशा रोमांचक लगते हैं। माहौल में तनाव साफ महसूस किया जा सकता था।
नीले रंग की पोशाक पहनी युवती का किरदार बहुत रहस्यमयी लगा। वह चुपचाप बैठी थी लेकिन उसकी मौजूदगी सब पर भारी लग रही थी। उसकी आंखों में एक अलग ही चमक थी। जब वह घोड़े पर सवार होकर रेगिस्तान में गई, तो लगा कि वह किसी बड़े कार्य पर है। बेवकूफ बना रहा, मुखिया बन के लौटा की कहानियों में महिला पात्र अक्सर ऐसे ही मोड़ लाते हैं।
अंत में रेगिस्तान का दृश्य बहुत ही फिल्मी था। सूरज ढल रहा था और रेत पर सुनहरी रोशनी थी। घोड़ों पर सवार होकर निकलना किसी नई शुरुआत का संकेत लग रहा था। हवा में उड़ती रेत और पात्रों के कपड़े बहुत वास्तविक लगे। बेवकूफ बना रहा, मुखिया बन के लौटा जैसे साहसिक कार्यों में ऐसे परिदृश्य बहुत जरूरी होते हैं। यह दृश्य मन में बस गया।
नज़दीकी दृश्य में जब मुख्य पात्र की आंखें दिखाई दीं, तो उनमें एक अलग ही शक्ति थी। ऐसा लगा जैसे उनकी शक्तियां जागृत हो रही हों। यह दृश्य प्रभाव बहुत शानदार था। बेवकूफ बना रहा, मुखिया बन के लौटा में हीरो की शक्ति वृद्धि ऐसे ही दिखती है। दर्शक के रूप में यह पल सबसे ज्यादा उत्तेजित करने वाला था। बस यही जानना है कि आगे क्या होगा।
हरे कपड़ों वाले बुजुर्ग पुरुष की आवाज़ और हावभाव में बहुत वजन था। जब वह चाय के बर्तन से चाय डाल रहे थे, तो लगा कि वह सब कुछ नियंत्रित कर रहे हैं। उनकी सलाह या आदेश सभी के लिए महत्वपूर्ण हैं। बेवकूफ बना रहा, मुखिया बन के लौटा में मार्गदर्शक किरदार ऐसे ही होते हैं जो रास्ता दिखाते हैं। उनका अभिनय बहुत प्रभावशाली लगा।
जब दो पात्र एक दूसरे के सामने खड़े थे, तो हवा में तनाव था। एक की शांति और दूसरे की घबराहट साफ दिख रही थी। यह टकराव का दृश्य बहुत अच्छे से बनाया गया था। बेवकूफ बना रहा, मुखिया बन के लौटा में ऐसे नाटकीय पल कहानी को आगे बढ़ाते हैं। संवाद नहीं थे फिर भी सब कुछ समझ आ रहा था। दृश्य कथा बहुत मजबूत थी।
कपड़ों की बनावट, बालों की हिलने की तरीका और रोशनी का खेल बहुत बेहतरीन था। हर पल में इतनी मेहनत साफ झलकती है। चाय से निकलती भाप से लेकर रेगिस्तान की रेत तक, सब कुछ जीवंत लगा। बेवकूफ बना रहा, मुखिया बन के लौटा जैसी श्रृंखला में गुणवत्ता ऐसे ही होनी चाहिए। तकनीकी पक्ष से यह दृश्य बहुत संतुष्टि देने वाला था।
पूरा दृश्य एक सफर की तरह लगा। घर से शुरू होकर रेगिस्तान तक का सफर बहुत रोमांचक था। पात्रों के बीच के रिश्ते और उनकी मंजिल के बारे में जानने की इच्छा हुई। बेवकूफ बना रहा, मुखिया बन के लौटा की विषय के साथ यह यात्रा बहुत अच्छे से संगत करती है। अंत देखकर लगा कि असली कहानी तो अब शुरू होने वाली है।