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दीवार के पार दुश्मनवां32एपिसोड

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दीवार के पार दुश्मन

आदित्य सिंह की पूरी फाल्कन टीम को ब्लैक टाइगर गैंग मार चुका है। सिर्फ आदित्य बचा। पंद्रह साल तक वह दुश्मन को ढूंढता रहा, पर कोई सुराग नहीं मिला। आत्महत्या करने से पहले वह सुनता है कि बगल की बेसमेंट में आवाज़ है, जहाँ सालों से कोई नहीं रहता। छुपकर देखने पर पता चलता है कि अंदर वही लोग हैं जिन्हें वह ढूंढ रहा था। अब आदित्य उन बुजुर्गों और साथियों के माता-पिता की रक्षा भी करना चाहता है और अपना बदला भी लेना चाहता है। वह दुश्मन को आपस में लड़ाता है, लेकिन क्या वह इन सबके बीच सबको बचा पाएगा?
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इस एपिसोड की समीक्षा

तनाव से भरा पल

इस दृश्य में तनाव इतना ज्यादा है कि सांस रुक जाती है। पहिए वाली कुर्सी पर बैठा व्यक्ति बिल्कुल शांत है जबकि चमड़े का जैकेट पहने व्यक्ति गुस्से में है। दीवार के पार दुश्मन की कहानी में यह मोड़ बहुत जरूरी था। बंदूक की नोक पर बातचीत देखकर रोंगटे खड़े हो गए। काश यह दृश्य सिनेमाघर में देखने को मिलता। बहुत ही दमदार अभिनय है और हर पल संदेह बना रहता है कि अब क्या होगा।

बच्ची के सामने खतरा

छोटी बच्ची के सामने इतनी हिंसा दिखाना हिम्मत का काम है। लंबे बालों वाले किरदार की आंखों में नफरत साफ दिख रही है। दीवार के पार दुश्मन में ऐसे दृश्य बार-बार देखने को मिलते हैं। पहिए वाली कुर्सी वाले का धैर्य देखकर हैरानी हुई। कमरे का माहौल भी बहुत डरावना बनाया गया है। हर पल लगता है कि अब गोली चल जाएगी और कुछ भी हो सकता है।

फोन का ट्विस्ट

दूरभाष की घंटी बजते ही माहौल बदल गया। चमड़े का जैकेट पहने व्यक्ति भ्रमित हो गया। दीवार के पार दुश्मन की पटकथा में यह मोड़ बहुत अच्छा लगा। पहिए वाली कुर्सी वाले की आंखों में डर नहीं बल्कि गुस्सा था। बूढ़े व्यक्ति के आने से कहानी में नया मोड़ आएगा। अब देखना है कि आगे क्या होता है और कौन जीतता है।

खामोश युद्ध

मारधाड़ वाला दृश्य नहीं है फिर भी धड़कनें तेज हो जाती हैं। बंदूक की नोक पर सवाल पूछना खतरनाक खेल है। दीवार के पार दुश्मन में हर किरदार का अपना मकसद है। पहिए वाली कुर्सी वाले के हाथ की पकड़ ढीली नहीं हुई। लंबे बालों वाले का गुस्सा असली लग रहा था। ऐसे रोमांचक कहानियां देखने में बहुत मजा आता है और नींद उड़ जाती है।

कमरे का खौफ

कमरे की सजावट सुंदर है लेकिन माहौल खौफनाक है। पंखा चल रहा है पर पसीना आ रहा है। दीवार के पार दुश्मन की छायांकन बहुत गहरी है। पहिए वाली कुर्सी वाले ने हार नहीं मानी। चमड़े का जैकेट पहने व्यक्ति जोर-जोर से चिल्ला रहा था। अंत में बूढ़े व्यक्ति के आगमन ने सब बदल दिया और सब हैरान रह गए।

बच्ची का डर

बच्ची के चेहरे पर डर साफ झलक रहा था। पहिए वाली कुर्सी वाले ने उसे बचाने की कोशिश की। दीवार के पार दुश्मन में भावनात्मक पहलू भी मजबूत है। बंदूक पकड़ने का तरीका बहुत पेशेवर लगा। लंबे बालों वाले की अभिनय ने जान डाल दी। हर दृश्य में कुछ नया खुलासा होता है और दर्शक बंधे रहते हैं।

दिमाग की ताकत

यह दृश्य बताता है कि ताकत शरीर में नहीं दिमाग में होती है। पहिए वाली कुर्सी पर बैठकर भी वह डटा रहा। दीवार के पार दुश्मन की कहानी बहुत पेचीदा है। चमड़े का जैकेट पहने व्यक्ति गलतफहमी में था। दूरभाष संपर्क ने सब कुछ स्पष्ट कर दिया। अब अगले भाग का इंतजार नहीं हो रहा और उत्सुकता बढ़ रही है।

आंखों की बात

संवाद कम हैं लेकिन आंखों की बातें बहुत हैं। पहिए वाली कुर्सी वाले की चुप्पी शोर मचा रही थी। दीवार के पार दुश्मन में ऐसे बिना संवाद वाले दृश्य श्रेष्ठ हैं। लंबे बालों वाले ने बंदूक तानी रखी। कमरे की रोशनी भी डरावनी थी। बूढ़े व्यक्ति के चेहरे पर चिंता साफ दिख रही थी और सब कुछ बदल गया।

मनोवैज्ञानिक खेल

मारधाड़ से ज्यादा मनोवैज्ञानिक युद्ध चल रहा है। पहिए वाली कुर्सी वाले ने हिलना भी मुनासिब नहीं समझा। दीवार के पार दुश्मन में रहस्य बना हुआ है। चमड़े का जैकेट पहने व्यक्ति जल्दबाजी में था। दूरभाष उठाते ही उसका चेहरा बदल गया। ऐसे मोड़ कहानी को आगे बढ़ाते हैं और दर्शकों को बांधे रखते हैं।

अंत का इंतजार

अंत में दरवाजे पर खड़ा व्यक्ति कौन है यह जानना जरूरी है। पहिए वाली कुर्सी वाले की किस्मत अब उसके हाथ में है। दीवार के पार दुश्मन का चरमोत्कर्ष पास आ रहा है। लंबे बालों वाले की परेशानी बढ़ गई है। बंदूक अब भी हाथ में है। अगला दृश्य और भी धमाकेदार होगा और सब कुछ स्पष्ट होगा।