इस भोज के दृश्य में तनाव साफ दिख रहा है। भूरे कोट वाले व्यक्ति का क्रोध देखकर लगता है कि कोई पुरानी दुश्मनी चल रही है। वहीं आरव सिंह का शांत रहना और दूरभाष देखना बहुत रहस्यमयी है। वैद्य भी, योद्धा भी शृंखला में ऐसे मोड़ बहुत आते हैं। अभिनय बहुत स्वाभाविक लग रहा है। दर्शक के रूप में मैं इस चरमोत्कर्ष का इंतजार कर रही हूं। हर पात्र की अपनी एक अलग कहानी लगती है। माहौल में जो खामोशी है वो शोर से ज्यादा तेज है।
शिया वर्मा की सहेली यशोदा यादव ने जिस तरह से उसे संभाला, वो काबिले तारीफ है। मित्रता की असली परीक्षा ऐसे ही वक्त में होती है। गुलाबी पोशाक वाली व्यक्ति बहुत उदास लग रही थी। देवाशीष तिवारी की हंसी भी कुछ सवाल खड़े करती है। वैद्य भी, योद्धा भी की कहानी में ये रिश्ते बहुत अहम हैं। मुझे ये देखना है कि आगे क्या होता है। क्या ये मित्रता बची रहेगी। सबको ये देखना चाहिए।
अनिल मल्होत्रा का पात्र बहुत गहरा लग रहा है। वो चुपचाप सब कुछ देख रहा है। मेज पर भोजन तो है पर किसी का ध्यान नहीं है। माहौल में अजीब सी खामोशी है। वैद्य भी, योद्धा भी में ऐसे नाटकीय पल बहुत अच्छे लगते हैं। नेटशॉर्ट पर दृश्य गुणवत्ता भी बहुत अच्छी है। मैं हर कड़ी का बेसब्री से इंतजार करती हूं। ये कार्यक्रम बहुत पसंद आ रहा है। कहानी बहुत रोचक है।
जब वो खड़ा हुआ तो लगा अब बड़ा झगड़ा होगा। भूरे कोट वाले ने मेज थपथपाकर क्रोध दिखाया। लेकिन सफेद कोट वाले ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। ये चुप्पी शोर से ज्यादा तेज थी। वैद्य भी, योद्धा भी की पटकथा बहुत मजबूत है। हर संवाद में वजन है। मुझे ये शृंखला बहुत पसंद आ रही है। कहानी में उतार चढ़ाव बहुत अच्छे हैं। लागत भी अच्छी लग रही है। निर्माण श्रेष्ठ है।
कमरे की सजावट बहुत लग्जरी है। छत की रोशनी और चित्र क्लासी लग रहे हैं। ऐसे माहौल में ये लड़ाई और भी अजीब लग रही है। शायद ये कोई व्यापारिक बैठक थी जो गलत हो गई। वैद्य भी, योद्धा भी में निर्माण मूल्य बहुत अच्छे हैं। वस्त्र और मंच सजावट बहुत आंखों को भाते हैं। मैं इसे जरूर सबको बताऊंगी। बहुत शानदार काम है। हर छवि सुंदर है।
चेकर्ड कोट वाले की हंसी में कुछ चालाकी है। वो शायद इस झगड़े का मजा ले रहा है। वहीं नीले ऊनी परिधान वाली व्यक्ति बस देख रही है। हर किसी के चेहरे पर अलग भाव हैं। वैद्य भी, योद्धा भी में पात्रों की गहराई बहुत अच्छी है। मुझे हर किसी के पीछे की कहानी जानने की उत्सुकता है। ये कार्यक्रम बहुत रोचक है। हर पल नया मोड़ लेता है। मैं हैरान रह गई।
दूरभाष देखने वाला व्यक्ति सबसे अलग है। शायद उसे सब पर भरोसा नहीं है। या फिर वो कोई बड़ी योजना बना रहा है। उसकी आंखों में एक अलग चमक है। वैद्य भी, योद्धा भी का ये पात्र मुझे सबसे ज्यादा पसंद आया। उसका व्यवहार बहुत जचता है। ऐसे पात्र पर्दे पर कम ही देखने को मिलते हैं। मुझे उसका अगला कदम देखना है। बहुत शानदार है।
गुलाबी कोट वाली व्यक्ति की आंखों में आंसू थे। वो कुछ कहना चाह रही थी पर रुक गई। उसकी सहेली ने उसे बांहों में भर लिया। ये पल बहुत भावुक था। वैद्य भी, योद्धा भी में भावुक दृश्य बहुत दिल को छू लेते हैं। मुझे लगा मैं भी उसकी जगह होती तो क्या करती। अभिनेत्री ने बहुत अच्छा किया। दर्शक भी रो पड़े। दिल दहल गया।
सहपाठियों का ये पुनर्मिलन कुछ अच्छा नहीं लग रहा। पुराने सहपाठी एक दूसरे के सामने शत्रु बन गए हैं। समय ने सब कुछ बदल दिया है। वैद्य भी, योद्धा भी का विषय बहुत अपनापन लगने वाला है। हमारे जीवन में भी ऐसे पल आते हैं। इस कार्यक्रम ने मुझे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया। ये सिर्फ मनोरंजन नहीं है। इसमें गहराई है। सबको पसंद आएगा।
अंत में जब सब खड़े हो गए तो लगा दृश्य समाप्त हुआ। लेकिन कहानी तो अभी शुरू हुई है। अगली कड़ी में क्या होगा ये जानने की बेचैनी है। वैद्य भी, योद्धा भी का हर भाग रहस्य पर खत्म होता है। नेटशॉर्ट पर इसे देखना बहुत आसान है। मैं रात भर इसी को देखती रहूंगी। बहुत बढ़िया कार्यक्रम है। सबको देखना चाहिए। मैं प्यार करती हूं।