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(डबिंग) ठुकराया हुआ इक्कावां49एपिसोड

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(डबिंग) ठुकराया हुआ इक्का

“योद्धा” अर्जुन नकाब उतारने की रस्म में गायब हो जाता है। माँ की अंतिम इच्छा से वह तीन साल तक मार्शल आर्ट्स छोड़कर बहन के साथ साधारण जीवन जीता है। प्रतियोगिता से पहले बहन हारने लगती है, अर्जुन छिपकर मदद करता है पर उसका मज़ाक उड़ता है। संकट में वह अपनी शक्ति दिखाकर दुश्मनों को हराता है, मगर पता चलता है कि उसका स्थान “प्रकाश मंडल” ने दुश्मनों को दे दिया। सच जानने के लिए वह चयन में उतरता है और अंत में उनके खतरनाक अध्यक्ष से भिड़ता है।
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इस एपिसोड की समीक्षा

नायक का धमाकेदार प्रवेश

जब नायक ने अपनी बहन को जमीन पर गिरते देखा तो उसका गुस्सा सातवें आसमान पर था। उसने किसी को नहीं बख्शा और सीधा खलनायक के चंगुल से उसे आजाद कराया। डबिंग ठुकराया हुआ इक्का में ऐसे ही मारधाड़ वाले दृश्यों की उम्मीद थी जो पूरी हुई। लड़ाई के दौरान जो संवादबाजी हुई वो दिल को छू गई। चांदी जैसे सूट वाले गुंडे भी कुछ खास नहीं कर पाए। नायक की ताकत के आगे सब फीके पड़ गए। यह दृश्य बार बार देखने लायक है।

खलनायक की घमंडी चाल

सूट पहने हुए आदमी को अपनी ताकत पर बहुत घमंड था। उसने सोचा था कि लड़की को आसानी से हरा दिया जाएगा। लेकिन उसे क्या पता था कि उसका भाई इतना खतरनाक निकलेगा। जब उसने चश्मा पहना तो लगा कि अब कुछ बड़ा होने वाला है। डबिंग ठुकराया हुआ इक्का की कहानी में यह मोड़ बहुत अच्छा लगा। खलनायक के चेहरे का डर देखने लायक था जब नायक ने दोनों गुंडों को एक साथ पटक दिया। असली ताकत तकनीक नहीं खून में होती।

बहन के लिए लड़ाई

भाई और बहन का रिश्ता इस झलक में बहुत गहराई से दिखाया गया है। जब उसने कहा कि मेरी बहन को हाथ लगाया तो रोंगटे खड़े हो गए। बदले की आग में उसने सबको रास्ता दिखा दिया। मीरा भी कम नहीं थी जो चोट लगने के बाद भी खड़ी हो गई। डबिंग ठुकराया हुआ इक्का में भावना और मारधाड़ का बेहतरीन संगम है। नायक ने साफ कर दिया कि परिवार की इज्जत से बढ़कर कुछ नहीं। खलनायक के पास पैसे थे पर नायक के पास जज्बा था।

तकनीक बनाम ताकत

खलनायक के गुंडों के पास उन्नत चश्मे थे जिससे वे नायक की धड़कन नाप रहे थे। उन्हें लगा कि जानकारी से जीत मिल जाएगी। पर नायक की कच्ची मुक्कों के आगे उनके यंत्र विफल हो गए। यह संदेश बहुत स्पष्ट है कि इंसानी हुनर यंत्र से ऊपर है। डबिंग ठुकराया हुआ इक्का में यह संघर्ष बहुत रोचक लगा। नायक ने बिना किसी डर के सीधा दिल पर वार किया। दृश्य प्रभाव भी काफी आकर्षक थे जो पर्दे पर जंच रहे थे।

लड़ाई की योजना कमाल

मारधाड़ वाले दृश्यों की योजना बहुत सटीक है। नायक ने कैसे चेन को तोड़ा और फिर गुंडों को उड़ाया, सब कुछ प्रवाह में था। कोई भी चाल फालतू नहीं लगा। खलनायक के हैरान होने के भाव भी लाजवाब थे। डबिंग ठुकराया हुआ इक्का की इस कड़ी में जोश की कमी नहीं है। नायक की काली पोशाक उसकी व्यक्तित्व पर सूट कर रही थी। दर्शक बंधे रहेंगे अंत तक। हर पल रोमांच से भरा था।

संवाद की मार

जब नायक ने कहा कि अब मैं इन्हें सबक सिखाऊंगा तो लग गया कि अब मजा आएगा। खलनायक ने घबराकर दोनों को हमला करने का आदेश दिया पर सब बेकार गया। संवादों की अदायगी में दम था। डबिंग ठुकराया हुआ इक्का की कथा में जान है। नायक ने अपनी ताकत का घमंड नहीं किया बस काम किया। खलनायक का पसीना छूटने लगा जब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। यह पुरानी बदले की कहानी है।

मीरा का साहस

लड़की शुरू में जख्मी थी लेकिन उसने हार नहीं मानी। जब भाई ने पूछा तो उसने कहा हां मैं ठीक हूं। यह दिखाता है कि वह भी कमजोर नहीं है। नायक को ताकत मिली अपनी बहन की सुरक्षा से। डबिंग ठुकराया हुआ इक्का में महिला किरदार भी मजबूत दिखाए गए हैं। खलनायक की नीयत खराब थी पर नायक की नीयत साफ थी। अंत में खलनायक अकेला पड़ गया था अपने महल में।

रहस्य बना रहे

शुरू में लगा कि नायक हार जाएगा क्योंकि वह चेन से बंधा था। लेकिन उसने अपनी ताकत से सब तोड़ दिया। खलनायक के चेहरे पर डर साफ दिख रहा था। चश्मे वाला दृश्य बहुत अनोखा था। डबिंग ठुकराया हुआ इक्का में हर मोड़ पर नया बदलाव है। नायक ने बिना हथियार के सबको हरा दिया। यह दिखाता है कि असली हथियार इंसान का हुनर है। खलनायक की चालें उल्टी पड़ गईं।

अंत में खलनायक की हालत

झलक के अंत में खलनायक ने चश्मा पहना लेकिन उसका कोई फायदा नहीं हुआ। नायक ने उसे घेर लिया था। अब बदले की बारी थी। माहौल बहुत तनावपूर्ण हो गया था। डबिंग ठुकराया हुआ इक्का का अंत बहुत धमाकेदार होने वाला है। नायक की आंखों में गुस्सा साफ दिख रहा था। खलनायक अब भागने का रास्ता ढूंढ रहा था। यह जज्बाती नाटक है। सबकी सांसें रुक गई थीं।

कुल मिलाकर शानदार

यह झलक पूरी तरह से मनोरंजन से भरी है। मारधाड़, भावना और नाटक सब कुछ है। नायक के प्रवेश ने सबका दिल जीत लिया। खलनायक की करतूतें सामने आ गईं। डबिंग ठुकराया हुआ इक्का को जरूर देखना चाहिए। मंच की सजावट भी पुराने ढंग की थी जो लड़ाई के लिए उत्तम थी। नायक ने साबित कर दिया कि वह सब पर भारी है। यह झलक मन बहलाती है।