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असली वारिस, सच्ची जीतवां44एपिसोड

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असली वारिस, सच्ची जीत

अनाथालय में पली सुस्मिता जब वर्मा परिवार की असली बेटी निकलती है, तो अपनी लैब के लिए फंडिंग पाने वापस लौटती है और आदिती वर्मा बन जाती है। घर में जय और अनन्या के तानों के बावजूद, वह अपनी प्रतिभा से सबको प्रभावित करती है। ईर्ष्या में अनन्या उसकी रिसर्च लीक करने और विस्फोटक उड़ाने की कोशिश करती है, लेकिन आदिती उसे हर बार विफल कर देती है। अंत में आदिती परिवार की असली उत्तराधिकारी बनती है और अनन्या को सजा मिलती है।
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इस एपिसोड की समीक्षा

बाथरूम का तनावपूर्ण दृश्य

बाथरूम वाला दृश्य बहुत तनावपूर्ण था। सफेद पोशाक वाली लड़की ने जब जेब में कुछ छुपाया, तो मुझे शक हुआ। गुलाबी पोशाक वाली की आंखों में चालाकी साफ दिख रही थी। परिवार के बीच यह छिपी दुश्मनी देखकर रोमांच बढ़ गया। असली वारिस, सच्ची जीत में ऐसे मोड़ बार-बार दिल को छू लेते हैं। किरदारों की शारीरिक भाषा बहुत मजबूत है। दर्शक को बांधे रखने की कला इसमें है।

खाने की मेज पर गुस्सा

खाने की मेज पर बुजुर्ग का गुस्सा देखकर डर लगा। विजय वर्मा जैसे किरदार जब बोलते हैं तो माहौल बदल जाता है। सबकी सांसें रुक सी गई थीं। यह शो परिवार की राजनीति को बहुत बारीकी से दिखाता है। असली वारिस, सच्ची जीत की कहानी में हर किरदार का अपना राज है। मुझे यह पुराने जमाने का घर और सजावट बहुत पसंद आई। कलाकारों का चयन भी बहुत सटीक है।

गुलाबी पोशाक वाली की चालाकी

गुलाबी पोशाक वाली लड़की की मासूमियत के पीछे छिपी चालाकी देखते ही बनती है। जब वह मुस्कुराती है तो लगता है कुछ गड़बड़ है। सफेद पोशाक वाली लड़की शांत रहकर भी सब पर भारी पड़ रही है। असली वारिस, सच्ची जीत में महिला किरदारों की लड़ाई देखने लायक है। हर कड़ी में नया मोड़ मिलता है जो बांधे रखता है। यह कहानी समाज का आईना है।

दादा जी का लाल चेहरा

दादा जी का चेहरा जब गुस्से से लाल हुआ तो लगा अब बड़ा धमाका होगा। परिवार के सभी सदस्य चुपचाप खड़े थे। विजय वर्मा की पत्नी भी चुप नहीं बैठी थीं। असली वारिस, सच्ची जीत में हर रिश्ते की परतें धीरे धीरे खुलती हैं। मुझे यह पारंपरिक खानपान और बैठने का तरीका बहुत अच्छा लगा। संस्कृति का सुंदर चित्रण है।

सभा कक्ष की खामोशी

सभा कक्ष वाला दृश्य जहां सब आमने सामने थे, वहां की खामोशी शोर मचा रही थी। नीली पोशाक वाले आदमी के प्रवेश ने सबका ध्यान खींचा। लगता है अब खेल बदलने वाला है। असली वारिस, सच्ची जीत की पटकथा बहुत मजबूत है। हर संवाद में वजन है जो किरदारों की हैसियत बताता है। निर्देशन भी बहुत प्रभावशाली है।

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