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गाँव का गौरववां23एपिसोड

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गाँव का गौरव

90 के दशक में, गाँव का लड़का बचपन से होशियार था, लेकिन खुद को मूर्ख बनाकर रखता था। उसने पढ़ाई का मौका अपने बड़े भाई और बड़ी बहन को दे दिया और खुद घर पर माँ-बाप के सूअर पालने के काम में हाथ बँटाने लगा। उसे जानवर पालने की बहुत अच्छी समझ थी, इसलिए गाँव के लोग उसकी तारीफ करते थे। फिर लड़के ने शहर जाकर अपने बड़े भाई और बहन से मिलने का फैसला किया। उन दोनों ने शहर में अपनी जगह बना ली थी, पर उन्होंने लड़के को नीचा दिखाते हुए कहा कि वह ठीक से काम नहीं करता, बूढ़े माँ-बाप की देखभाल नहीं करता...
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इस एपिसोड की समीक्षा

बेटे का गुस्सा और दर्द

बेटे के गुस्से को देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। जब उसने कागज जमीन पर देखे तो उसकी आँखों में दर्द साफ था। गाँव का गौरव में ऐसे परिवारिक संघर्ष बहुत असली लगते हैं। माँ का रोना और पिता की चुप्पी सब कुछ कह रही है। यह दृश्य दिल को झकझोर देता है। नेटशॉर्ट पर देखने का अनुभव बहुत अच्छा रहा। हर कोई इसे देखे।

माँ का टूटा दिल

माँ का बेटे का हाथ पकड़ना और गिड़गिड़ाना बहुत दर्दनाक था। वह जानती है कि इस लड़ाई का अंत अच्छा नहीं होगा। बुजुर्ग अभिनेत्री ने कमाल का प्रदर्शन किया है। गाँव का गौरव में भावनात्मक गहराई हमेशा बनी रहती है। आँसू पोंछते हुए उसका चेहरा देखकर मन भारी हो गया। बहुत ही भावुक कर देने वाला दृश्य है।

जायदाद की लालसा

जायदाद के चक्कर में परिवार टूट रहा है। जमीन पर पड़ी ईंट मेहनत का प्रतीक लगती है। सूट वाला आदमी शायद इसका फायदा उठा रहा है। गाँव का गौरव की कहानी हमारे समाज की सच्चाई है। ऐसे कथानक देखकर लगता है कि लेखक ने बहुत शोध की है। बहुत ही रोचक मोड़ है। कहानी आगे बढ़ती जाएगी।

उम्मीद की किरण

गर्भवती महिला की मुस्कान इस तनाव में उम्मीद की किरण है। शायद वह आने वाले बच्चे के लिए बेहतर भविष्य चाहती है। नौजवान लड़का अपने अधिकार के लिए खड़ा है। गाँव का गौरव में हर किरदार की अपनी कहानी है। यह दृश्य बहुत ही प्रभावशाली ढंग से फिल्माया गया है। सबको पसंद आएगा।

पिता और पुत्र का संघर्ष

पिता और बेटे के बीच की बहस बहुत तीखी थी। दोनों की आँखों में आँसू थे लेकिन गुस्सा भी साफ था। ऐसा लग रहा था कि रिश्ते टूटने की कगार पर हैं। गाँव का गौरव में नाटक कभी नीरस नहीं होता। मैं हर कड़ी का बेसब्री से इंतजार करता हूं। यह कार्यक्रम सबसे अलग है।

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