दादी माँ की आँखों में वो चमक देखकर दिल भर आया। जब वो पोते को देखकर रो पड़ीं, तो लगा जैसे सालों का इंतज़ार खत्म हुआ। गाँव का गौरव श्रृंखला में ऐसा भावुक पल कम ही देखने को मिलता है। खाने की मेज पर सबकी चुप्पी भी कहानी कह रही थी। हर किसी के चेहरे पर अलग भाव थे।
लाल साड़ी वाली बहू का चेहरा देखकर लग रहा था कि वो कुछ छुपा रही है। कोट पहने भाई की बातें थोड़ी घमंडी लग रही थीं, लेकिन असली बेटा तो वो है जो थैला लेकर आया। इस गाँव का गौरव नाटक में हर किरदार की अपनी अहमियत है। माहौल बहुत असली लगा। सबकी साँसें थमी हुई थीं।
बाहर का सूरज और अंदर का जज़्बात दोनों ही तेज़ थे। जब वो मज़दूर भाई तौलिया कंधे पर डालकर आया, तो सबकी साँसें रुक गईं। गाँव का गौरव की कहानी में ये मोड़ बहुत जरूरी था। मिट्टी से सने जूते और वो थकी हुई शक्ल सब बता रही थीं। वो मेहनत का प्रतीक लग रहा था।
दादा जी का गुस्सा और फिर प्यार, दोनों ही देखने लायक थे। उन्होंने जो उंगली उठाकर बात की, उसमें दबदबा था। खाने की मेज पर बैठे हर सदस्य की प्रतिक्रिया अलग थी। गाँव का गौरव में परिवार के बंधन को बहुत खूबसूरती से दिखाया गया है। खाना ठंडा हो गया पर बातें गर्म थीं।
सफेद ओढ़नी वाली बहू ने मुँह पर हाथ रखकर सबका ध्यान खींच लिया। उसे शायद पहले से कुछ पता था। कोट वाले भाई के चेहरे पर हैरानी साफ़ दिख रही थी। गाँव का गौरव के इस कड़ी में रहस्य बना हुआ है। कौन है असली वारिस? सब यही सोच रहे थे।