रसोई में आग की लपटें देखकर ही तनाव का अंदाजा हो गया। धूसर कमीज वाले के चेहरे पर शांति थी जबकि काली कमीज वाला घबरा रहा था। उस थैले ने सब कुछ बदल दिया। गाँव का गौरव में ऐसे मोड़ देखना रोमांचक है। आखिर में उसका भागना हास्य भी था और डर भी। बहुत बढ़िया दृश्य था।
उस धारीदार थैले ने पूरी कहानी पलट दी। शुरू में लगा बस खाने को लेकर झगड़ा है, पर थैला आते ही माहौल बदल गया। गले पर पसीने की बूंदें डर को बयां कर रही थीं। गाँव का गौरव में बिना संवाद के इतनी अभिनय देखकर मज़ा आया। रसोइये की मुस्कान रहस्यमयी थी।
रसोइये की आँखों में एक अलग ही चमक थी। उसे चिल्लाने की ज़रूरत नहीं पड़ी, बस देखते रहना काफी था। जब उसने थैला मेज पर रखा, तो ताकत का संतुलन बदल गया। गाँव का गौरव में किरदारों का विकास बहुत गहरा है। उसकी घूरने की शैली सिनेमाई थी। आगे क्या होगा जानने को उत्सुक हूँ।
अंत बहुत अप्रत्याशित था। एक पल वह बहस कर रहा था, अगले पल दुकान से बाहर भाग रहा था। हास्य का समय बिल्कुल सही था। उस थैले में ज़रूर कुछ डरावना था। गाँव का गौरव हास्य और रहस्य को अच्छे से मिलाता है। परिवेश एक असली स्थानीय रेस्तरां जैसी लग रही थी। बहुत ही संबंधनीय परंतु नाटकीय।
रसोई के दृश्य में रोशनी व्यवस्था गंभीर थी। आग की लपटें बढ़ते तनाव से मेल खा रही थीं। चेहरों के निकट दृश्य ने हर भावना को पकड़ा। गाँव का गौरव दृश्य कहानी कहने का उपयोग जानता है। गंदा थैला साफ खाना पकाने वाली सतह के विपरीत था। शायद प्रतीकात्मक? छायांकन का बहुत आनंद लिया।