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गाँव का गौरववां54एपिसोड

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गाँव का गौरव

90 के दशक में, गाँव का लड़का बचपन से होशियार था, लेकिन खुद को मूर्ख बनाकर रखता था। उसने पढ़ाई का मौका अपने बड़े भाई और बड़ी बहन को दे दिया और खुद घर पर माँ-बाप के सूअर पालने के काम में हाथ बँटाने लगा। उसे जानवर पालने की बहुत अच्छी समझ थी, इसलिए गाँव के लोग उसकी तारीफ करते थे। फिर लड़के ने शहर जाकर अपने बड़े भाई और बहन से मिलने का फैसला किया। उन दोनों ने शहर में अपनी जगह बना ली थी, पर उन्होंने लड़के को नीचा दिखाते हुए कहा कि वह ठीक से काम नहीं करता, बूढ़े माँ-बाप की देखभाल नहीं करता...
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इस एपिसोड की समीक्षा

अचानक बदलाव ने चौंकाया

शुरुआत में झुकना और फिर अचानक गुस्सा देखकर बहुत हैरानी हुई। काले जैकेट वाले ने अपनी ताकत और अधिकार बहुत अच्छे से दिखा दिया। गाँव का गौरव में ऐसा नाटकीय मोड़ बिल्कुल नहीं सोचा था। मिट्टी की खुशबू और गुस्से का मिश्रण बेहतरीन है। नेटशॉर्ट पर देखने का मज़ा आ गया।

घमंड का अंत बुरा हुआ

ग्रे सूट वाले की घमंडी हरकतें देखकर बहुत गुस्सा आता है। कुर्सी तोड़ने वाला सीन बहुत दमदार और ताकतवर था। गाँव का गौरव की कहानी में ये संघर्ष बिल्कुल जरूरी था। धूल और पसीने के बीच जो एक्टिंग है वो लाजवाब है। हर डायलॉग दिल को छू जाता है।

परिवार की चिंता साफ झलकी

गर्भवती महिला की चिंता साफ दिख रही थी। जब लात चली तो सबकी सांसें रुक गईं। गाँव का गौरव में परिवार की सुरक्षा का मुद्दा बहुत गहराई से उठा है। आँखों के हावभाव ने सब कुछ कह दिया। ऐसे ड्रामे कम ही देखने को मिलते हैं।

धैर्य की जीत देखने मिली

काले जैकेट वाले की आँखों में आग थी। उसने चुपचाप सब सहन किया फिर वार किया। गाँव का गौरव में धैर्य की जीत बहुत खूबसूरती से दिखाई गई है। बैकग्राउंड में पुराने घर का माहौल बहुत असली लगता है। कहानी में जान है।

अहंकार का सबक मिला

ग्रे सूट वाला जमीन पर गिरा तो उसकी हालत खराब हो गई। अहंकार का अंत हमेशा बुरा होता है। गाँव का गौरव में ये सबक बहुत अच्छे से सिखाया गया है। एक्शन सीन्स बहुत तेज और सटीक हैं। देखने वाले को पसीना आ जाए।

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